Wednesday, 27 November 2019

"85 के दादाजी" और "गूगल का पैसा"

"85 के दादाजी" और "गूगल का पैसा"
85 के दादाजी
"कुछ काम कर भी लिया करो, सारा दिन मोबाईल में लगे रहते हो" अचानक पीछे से सन्नाटे को चीरती हुई एक आवाज मेरे कानो तक पहुंची | पीछे देखा तो दादाजी जो कि 85 साल के थे, वो मेरे पीछे खड़े थे | मेने कहा दादाजी में ऑनलाइन काम कर रहा हूँ यही मेरा काम है | "ये भी कोई काम है, में बुजुर्ग भले ही हो गया हूँ पर बेबकुफ़ नही जो इन बचकानी बातों को सही मान लूँ | अरे बाहर जाओ कोई नोकरी करो, व्यापार करो जिससे चार पैसे हाथ में आये | अब उठता है की लगाऊ दो चार, एक कान से सुनते है और दुसरे कान से बाहर निकाल देते है आजकल के बच्चे | तेरे बाप की हिम्मत नही होती थी, मुझसे बात भी करने की | समझ में आ रहा है कुछ |
में उनके बड़ते गुस्से को देखता ही रह गया, आखिर इस ऑनलाइन के व्यापार को कैसे समझाऊ | मेने बड़ी धीमी आवाज में कहा दादाजी गूगल देता है पैसा काम करने के लिए | "गूगल कौन है ये नालायक" बुला इसे मेरे पास, जो बच्चो को  मोबाईल चलाने के पैसे दे रहा है | बड़े बाप की औलाद है क्या ये, तू बुला अभी उसे |
मेरी समझ में नही आ रहा था आखिर दादाजी को कैसे समझाऊ, मेने कहा गूगल कोई आदमी नही एक कम्पनी है, जो अलग अलग तरह के काम करवा कर पैसे देती है | "वो कैसे जरा समझा मुझे" इतना कहकर दादाजी मेरे सामने रखी कुर्सी पर बैठ गये | 

गूगल का पैसा

अब समझाना तो था ही तो समझाना शुरू किया मेने कहा दादाजी आप पहले क्या काम करते थे, "प्रिटिंग प्रेस थी पर  वो तो बहुत पहले हुआ करती थी" उससे इसका क्या मतलब | मेने कहा आपसे लोग अपनी दुकान का प्रचार करवाने के लिए पम्पलेट छपवाते थे, क्यूंकि लोगो को पता चले की कोई दुकान है जो सामान बेचती है |
लेकिन उनकी सबसे बड़ी दिक्कत ये आती थी, कि आखिर उन पर्चो को कहा चिपकाया जाये, जिससे लोगो की नजर उस पर पड़ सके | उदहारण के तौर पर  दीवारों पर, या अखवारों में लेकिन उसका भी भरोसा नही की वो पर्चा लोगों की निगाह में आ पाए | अगर ऐसा हो की कोई एसी दीवार बना दी जाये, जिसे लोग हमेशा ही देखते हो, लोग उसे पसंद करते हो , अगर ऐसा हो जाये तो| "अगर ऐसा हो जायेगा तो लोग उस दीवार पर पोस्टर पर्चे लगाने के लिए टूट पड़ेंगे | मगर एसी दीवार होगी कोनसी,  दादाजी ने बड़ी उसुकता से पूछा |
दादाजी वो दीवार है इन्टरनेट की दीवार, यहाँ पर करोड़ो लोग आते है  अपना समय बिताते है | मेनें भी इस इंटेरनेट की दुनिया में अपनी एक दीवार बना ली है, जिसे blogger कहते है |
इस दीवार में जिन्दगी, दुनियां , हंसी-मजाक , सुख-दुःख, की बात लिखता हूँ | जो लोगों को बहुत पसंद आती है | चूँकि मेरी इस दीवार को देखने वालो की संख्या ज्यादा है तो कंपनी वाले चाहते है की मेरी इस दीवार पर उनके प्रचार के पोस्टर लगाये जाये | पर न तो मुझे पता है की कोनसी कंपनी अपना पोस्टर लगवाना चाहती है और न कंपनी को पता है की किसकी दीवार को देखने के लिए ज्यादा से ज्यादा लोग आते है | तो दादाजी यहाँ से शुरुआत होती है गूगल की, जो की कंपनी और मेरे बीच की कड़ी है |कंपनी गूगल को अपना विज्ञापन देती है और गूगल मुझे उस कंपनी का विज्ञापन है | और जो पैसे कम्पनी इस काम के लिए देती है उसमे से कुछ गूगल अपने पास रखता है और कुछ हमें देता है | हैं न दादाजी नए ज़माने का डिजिटल काम |
दादाजी - बेटा काम तो अच्छा है पता हो नही था ऐसा भी कोई काम होता है | फिर भी अपनी सेहत का ख्याल रखना न भूलना, जान है तो जहान है | और दादाजी वहां से जाने लगे , जाते जाते ददजी ने १ बात पूछी बेटा क्या में भी बना सकता हूँ एसी डिजिटल दीवार , मेने कहा हा क्यों नही दादाजी | लेकिन आप किस लिए बनाना चाहते है | " पैसो के लिए तो बिलकुल नही, बस अपनी जिन्दगी की लम्हों को लोगों तक पहुचाने के लिए |
दादाजी ने एक आह भरी और कमरे से निकल लिए .........|

                                                                                                                            -  अतुल गुप्ता 

Sunday, 24 November 2019

टैलेंट होता नही बल्कि बनाया जाता है |

"टैलेंट ,धैर्य एवं किस्मत"
वरुण ग्रोवर जिनका परिचय देने की कोई जरुरत महसूस नही होती, उनका नाम ही काफी है, वो किसी परिचय के मोहताज नही |
साहित्य के मंच पर कही गई ये लाइन बहुत से युवाओं को एक संदेश दे गई, की टेलेंट की परिभाषा असल में कुछ और ही है | ज्यादातर जब किसी सफल व्यक्ति से से सफलता का राज पूछा जाता है तो 2 ही बाते सुनने को मिलती है, 1 तो हार्ड मेहनत, और दूसरा बचपन से टेलेंट का होना| ये 'टेलेंट का होना' एक ऐसा शब्द है जो व्यक्ति को निराश कर देता है, वो दुसरे व्यक्तियों से अपने आप को कम महसूस करता है, या उसको समझ में ही नही आता की वाकई उनमें कुछ अनोखा है जो उसमें टेलेंट दिखा सके | में भी पहले यही सोचता था की कुछ लोग वाकई किस्मत वाले होते है जिनके अन्दर बचपन से ही टेलेंट होता है , हाँ अबतक तो में यही सोचता था |
लेकिन यूट्यूब पर जब उस INTERVIEW को देखा तो असल में सभी शब्दों का मतलब समझ में आया |
"टैलेंट ,धैर्य एवं किस्मत" 
वरुण सर ने बहुत ही कम शब्दों में असल में इनका मतलब समझाया , सही मायने में देख जाये तो किस्मत अपने हाथ में नही होती | कोई व्यक्ति ये नही कह सकता की उसकी किस्मत बहुत अच्छी है जबतक उसके साथ कुछ गलत न घटित हो जाये | आप किसी भी व्यक्ति से पूछोगे की आपकी किस्मत अच्छी है तो उसका जबाब होगा पता नही अभी तक तो कुछ अच्छा नही हो रहा जिन्दगी में तो सही मायने में किस्मत को किस्मत के ऊपर ही छोड़ देते है | 
धैर्य  ही जीवन का सबसे कठिन कार्य है, क्योंकि यही वो समय होता है जब आपको अपने ऊपर पुरा विश्वास रखना होता है | हर पल आपको अपने आपको समझाना पड़ता है की अभी रुक अभी हम मंजिल के बहुत करीब है , मन का क्या वो तो भागेगा क्योंकि वो तो है ही चंचल, दिमाग आपको डराएगा, आपको दिखायेगा की अगर ये नही हुआ तो हम सबसे पिछड़ जायेंगे, हम उन असफल व्यक्तियों में आ जायेंगे जिनका मजाक ये दुनिया उड़ाती है | यही समय होता है जब हमें अपने दिमाग को विश्वास दिलाना होता है सब ठीक है बस अच्छे दिन आने वाले है, अपने दिमाग को उन सफल व्यक्तियों की जीवनी बताओ , उसे दिखाओं की कैसे उन्होंने बहुत बड़ा संघर्ष किया था अपनी पहचान बनाने के लिए और उन्होंने कैसे आखिर में अपनी पहचान बनाई थी |
टैलेंट सच में किसी भी व्यक्ति के पास कोई टैलेंट होता ही नही उसे ये सब मिलता है पड़कर, समझकर, और उस कार्य में अपनी अभिरुचि दिखाकर | असल में यही बात है जो मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित करती है और जिस से में अनजान था | टैलेंट, को अलग से शब्द से देखा जाये तो जिस काम में आपका मन लगता है, जो काम  सबसे ज्यादा अच्छा लगता है उसी को करना, उसी काम को अपने करियर के रूप में करना | जब आप अपने पसंदीदा काम को करते है तो आपका मन उस काम को अच्छी तरह और रूचि के साथ करता है | 
ये लेख बहुत से मेरे जैसे युवाओं को एक प्रेरणा देगा की हमें अपने लिए काम करना है, किसी को खुश करने के लिए नही | 

                                                                                                                             
                                                                                                                               (अतुल गुप्ता )