Sunday, 31 October 2021

              Navodaya Vidyalaya Samiti (NVS)  

Jawahar Navodaya Vidyalaya Selection Test for Class VI Online Form 2022 NVS Class 6 

 

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Tuesday, 14 July 2020


'छप्पन छुरी': जानकी बाई
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'सइयां निकस गए मैं न लड़ी थी, न जाने कौन सी खिड़की खुली थी'... कबीरदास का रचा भजन है। कबीर रहस्यवाद के पुरोधा हैं। मिट्टी के चोले से आत्मा को इस अंदाज में विदा देते हैं। जानकी बाई अपनी आवाज में जब इसे गाती थीं तो दरबारी महफ़िल ठुमक उठती थी और यह ठुमरी का अंदाज ले लेता था। उनकी आवाज बुलंद थी, मक़ाम भी उन्होंने बुलंद ही पाया। गायकी के ख़ास अंदाज से उनका नाम हिंदुस्तान की शुरुआती रिकार्ड की गई आवाजों की फेहरिस्त में शामिल हुआ।


जानकी बाई की पैदाइश बनारस (1880 ईसवी) की थी। पिता शिवबालक राम अखाड़े के पहलवान थे तो माँ मनकी संगीत की समझ रखने वाली रुचि सम्पन्न महिला। चंद रोज के ख़ुशनुमा बचपन के बाद उनके पिता ने माँ-बेटी से मुँह मोड़ लिया। मज़बूरन मनकी देवी ने अपना बनारस का घर बेच इलाहाबाद बसने का फैसला किया। उस वक़्त मदद देने के लिए जो हाथ बढ़ा वह भी स्वार्थ की चाशनी में डूबा हुआ था। मदद का स्वांग करने वाली स्त्री माँ-बेटी को एक कोठे के सुपुर्द कर चलती बनी। यहीं से जानकी बाई का शोहरत हासिल करने का सिलसिला शुरू हुआ।

संगीत की शिक्षा उन्होंने लखनऊ के हस्सू खान जी से हासिल की। गुरु की निगहबानी में उन्होंने अपने सुर को इस कदर साधा कि उनकी गिनती अपने समय की नामचीन गायिकाओं में होने लगी। उनकी शोहरत का अंदाजा इस बात से लगता है कि जार्ज पंचम की ताजपोशी (1910 ईसवी) के वक़्त उन्हें गौहर जान के साथ युगल गीत प्रस्तुत करने के लिए चुना गया। उनके युगल गान पर खुश होकर जार्ज पंचम के द्वारा सौ गिन्नियां भेंट करने का जिक्र दस्तावेजों में है।

जानकी बाई महफ़िलों में गाती जरूर थीं लेकिन ज्यादातर पर्दे से गाती थीं। एक दफे रीवा के महाराजा ने उनके दीदार की इच्छा जाहिर की तो उन्होंने सुर,साज और सीरत के हवाले से अपनी सूरत को बेपर्दा करने से सलीके से इनकार कर दिया। उनकी पर्देदारी से जुड़े कुछ किस्से मिलते हैं। कहते हैं कि किसी नाकामयाब सिरफिरे आशिक़ ने जुनून में उनके चेहरे को छप्पन दफ़े छुरी से गोद दिया था। इसी वजह से छप्पन - छुरी विशेषण उनके नाम से जुड़ गया। इस वाकये के समय उनकी उम्र बारह बरस बताई जाती है। आशिक का नाम रघुनंदन मिलता है जो पुलिस महकमें का मुलाजिम था। कुछ जगहों पर ये किस्सा उनकी सौतेली माँ के हवाले से दर्ज है। तवायफ के पेशे के साथ जुड़े खूबसूरती के स्टीरियोटाइप ने उन्हें मजबूर किया कि वह अपने हुनर और दिलकश आवाज को पर्दे से शाया करें।

संगीत की तालीम के साथ-साथ जानकी बाई ने अंग्रेजी,संस्कृत और फ़ारसी की शिक्षा भी हासिल की थी। खतो-किताबत कर लेती थीं। उनका एक दीवान (दीवान-ए-जानकी) भी मिलता है। खतो-किताबत की बात निकली है तो एक वाकया दर्ज करते चलें। सन 1911 का बरस इलाहाबाद के इतिहास में एक घटनापूर्ण बरस था। जनवरी से शहर महाकुम्भ की रौनक में डूबा था। पूरा हिंदुस्तान मानो इलाहाबाद में इकठ्ठा हुआ जाता था। फरवरी में शहर एक दूसरे जलसे की राह देख रहा था। जलसा भी क्या इतिहास में दर्ज होने वाली तारीख थी। अंग्रेजी हुकूमत की तरफ से यूनाइटेड प्रोविंस में एक औद्योगिक मेले का आयोजन किया गया था। इसी के तहत 18 फरवरी,1911 को हेनरी पिकेट दो सीटर बाई-प्लेन उड़ाने वाले थे। यह एक प्रतीकात्मक उड़ान थी जो दुनिया की पहली ऑफिशियल एयर मेल (First Aerial Post) लेकर जाने वाली थी। जाहिरन सरकार की तरफ से इसका खूब प्रचार हुआ था। तमाम दूसरे लोगों की तरह जानकी बाई ने भी इस ऐतिहासिक मौके पर तीन खत लिख छोड़े थे।

जलालत और अकीदत के बीच जिंदगी गुजारते हुए जानकी बाई सन 1934 में इलाहाबाद के काला डंडा कब्रिस्तान में सुपुर्दे ख़ाक हुईं। आज भी इलाहाबाद के आदर्श नगर इलाके में जीर्ण-शीर्ण पड़ती उनकी कब्र देखी जा सकती है। छप्पन छुरी का तमगा यहाँ भी उनके साथ है। लिखा मिलता है : 'छप्पन छुरी की मजार' ।

बीसवीं शताब्दी की दरबारी महफ़िलों की रौनक रही तवायफ़ों की शास्त्रीय संगीत को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनसे जुड़े किस्से संगीत की परंपरा से ही निसृत हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित हुए। कुछ किस्से लिखे मिलते है जो तवायफ़ों की खुद की कलम से हैं, कुछ मौखिक परंपरा से आये हैं। इनमें से कुछ आवाज बनकर महफूज़ हो गईं बाक़ी ग़र्क़ हुईं। आवाज ही इनकी पहचान है। आवाज जिसमें खनक है, मिठास है जो बारहा उदास है..
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Monday, 6 January 2020

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Queen (web series)

    Queen is a 2019 Indian historical drama web television series. It is based on the novel of the same name by Anita Sivakumaran, which is loosely based on the life of the late Tamil Nadu Chief Minister Jayalalithaa. The series was directed by Gautham Menon and Prasath Murugesan, written by Reshma Ghatala, and produced by Times studio originals and Ondraga Digital. It stars Ramya Krishnan and Indrajith Sukumaran.

Wednesday, 1 January 2020


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Dabangg 3 is a 2019 Indian Hindi-language action comedy film directed by Prabhu Deva and produced by Salman Khan and Arbaaz Khan under their respective banners of Salman Khan Films and Arbaaz Khan Productions.[4] The film serves as a circumquel the 2010 film Dabangg and 2012 film Dabangg 2, and is the third installment of the Dabangg film series. The screenplay of the film is written by Salman KhanPrabhu Deva, and Alok Upadhyaye. The story, written by Salman Khan, is set in the state of Madhya Pradesh.[5] The film features Salman Khan,[6] Sonakshi Sinha,[7]and Arbaaz Khan[8] reprising their roles from the previous film, along with Sudeep as the antagonist and Saiee Manjrekar in her Bollywood debut.

Saturday, 28 December 2019


CHARITRAHEEN

 वेव सीरिज (हिंदी में )


चारित्रीन एक वयस्क थ्रिलर वेब श्रृंखला है जो एक महिला के जीवन विकल्पों और व्यक्तिगत निर्णयों पर आधारित है। किरण की मुख्य भूमिका में नैना गांगुली अभिनीत, इस मनोरंजक शो में अभिनेता गौरव चटर्जी और सौरव दास की प्रतिभाएँ भी दिखाई देती हैं। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के इसी नाम के विवादास्पद 1917 उपन्यास पर आधारित, यह शो उनके पति की मृत्यु के बाद किरण के जीवन में आने वाले परिवर्तनों का अनुसरण करता है। चारित्रेन को सभी एपिसोड देखें और देखें कि किरण कुछ जीवन बदलने वाले विकल्प बनाती हैं जो उसे चरित्रहीन होने के वास्तविक अर्थ का पता लगाने के लिए धक्का देती हैं। आधुनिक शहरी पृष्ठभूमि में स्थापित यह शो प्रेम, वासना और झूठ की कहानी है जो किरण को यौन अन्वेषण की एक संघर्षपूर्ण यात्रा पर ले जाता है। क्या वह फिर से प्यार कर पाएगी या चरित्रहीन हो सकती है? किरन के अप्रत्याशित और रोमांचक जीवन में आने वाले ट्विस्ट और घुमावों का पता लगाने और उनका अनुसरण करने के लिए एमएक्स प्लेयर पर ऑनलाइन चैरीट्राहेन को स्ट्रीम करें।
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Wednesday, 27 November 2019

"85 के दादाजी" और "गूगल का पैसा"

"85 के दादाजी" और "गूगल का पैसा"
85 के दादाजी
"कुछ काम कर भी लिया करो, सारा दिन मोबाईल में लगे रहते हो" अचानक पीछे से सन्नाटे को चीरती हुई एक आवाज मेरे कानो तक पहुंची | पीछे देखा तो दादाजी जो कि 85 साल के थे, वो मेरे पीछे खड़े थे | मेने कहा दादाजी में ऑनलाइन काम कर रहा हूँ यही मेरा काम है | "ये भी कोई काम है, में बुजुर्ग भले ही हो गया हूँ पर बेबकुफ़ नही जो इन बचकानी बातों को सही मान लूँ | अरे बाहर जाओ कोई नोकरी करो, व्यापार करो जिससे चार पैसे हाथ में आये | अब उठता है की लगाऊ दो चार, एक कान से सुनते है और दुसरे कान से बाहर निकाल देते है आजकल के बच्चे | तेरे बाप की हिम्मत नही होती थी, मुझसे बात भी करने की | समझ में आ रहा है कुछ |
में उनके बड़ते गुस्से को देखता ही रह गया, आखिर इस ऑनलाइन के व्यापार को कैसे समझाऊ | मेने बड़ी धीमी आवाज में कहा दादाजी गूगल देता है पैसा काम करने के लिए | "गूगल कौन है ये नालायक" बुला इसे मेरे पास, जो बच्चो को  मोबाईल चलाने के पैसे दे रहा है | बड़े बाप की औलाद है क्या ये, तू बुला अभी उसे |
मेरी समझ में नही आ रहा था आखिर दादाजी को कैसे समझाऊ, मेने कहा गूगल कोई आदमी नही एक कम्पनी है, जो अलग अलग तरह के काम करवा कर पैसे देती है | "वो कैसे जरा समझा मुझे" इतना कहकर दादाजी मेरे सामने रखी कुर्सी पर बैठ गये | 

गूगल का पैसा

अब समझाना तो था ही तो समझाना शुरू किया मेने कहा दादाजी आप पहले क्या काम करते थे, "प्रिटिंग प्रेस थी पर  वो तो बहुत पहले हुआ करती थी" उससे इसका क्या मतलब | मेने कहा आपसे लोग अपनी दुकान का प्रचार करवाने के लिए पम्पलेट छपवाते थे, क्यूंकि लोगो को पता चले की कोई दुकान है जो सामान बेचती है |
लेकिन उनकी सबसे बड़ी दिक्कत ये आती थी, कि आखिर उन पर्चो को कहा चिपकाया जाये, जिससे लोगो की नजर उस पर पड़ सके | उदहारण के तौर पर  दीवारों पर, या अखवारों में लेकिन उसका भी भरोसा नही की वो पर्चा लोगों की निगाह में आ पाए | अगर ऐसा हो की कोई एसी दीवार बना दी जाये, जिसे लोग हमेशा ही देखते हो, लोग उसे पसंद करते हो , अगर ऐसा हो जाये तो| "अगर ऐसा हो जायेगा तो लोग उस दीवार पर पोस्टर पर्चे लगाने के लिए टूट पड़ेंगे | मगर एसी दीवार होगी कोनसी,  दादाजी ने बड़ी उसुकता से पूछा |
दादाजी वो दीवार है इन्टरनेट की दीवार, यहाँ पर करोड़ो लोग आते है  अपना समय बिताते है | मेनें भी इस इंटेरनेट की दुनिया में अपनी एक दीवार बना ली है, जिसे blogger कहते है |
इस दीवार में जिन्दगी, दुनियां , हंसी-मजाक , सुख-दुःख, की बात लिखता हूँ | जो लोगों को बहुत पसंद आती है | चूँकि मेरी इस दीवार को देखने वालो की संख्या ज्यादा है तो कंपनी वाले चाहते है की मेरी इस दीवार पर उनके प्रचार के पोस्टर लगाये जाये | पर न तो मुझे पता है की कोनसी कंपनी अपना पोस्टर लगवाना चाहती है और न कंपनी को पता है की किसकी दीवार को देखने के लिए ज्यादा से ज्यादा लोग आते है | तो दादाजी यहाँ से शुरुआत होती है गूगल की, जो की कंपनी और मेरे बीच की कड़ी है |कंपनी गूगल को अपना विज्ञापन देती है और गूगल मुझे उस कंपनी का विज्ञापन है | और जो पैसे कम्पनी इस काम के लिए देती है उसमे से कुछ गूगल अपने पास रखता है और कुछ हमें देता है | हैं न दादाजी नए ज़माने का डिजिटल काम |
दादाजी - बेटा काम तो अच्छा है पता हो नही था ऐसा भी कोई काम होता है | फिर भी अपनी सेहत का ख्याल रखना न भूलना, जान है तो जहान है | और दादाजी वहां से जाने लगे , जाते जाते ददजी ने १ बात पूछी बेटा क्या में भी बना सकता हूँ एसी डिजिटल दीवार , मेने कहा हा क्यों नही दादाजी | लेकिन आप किस लिए बनाना चाहते है | " पैसो के लिए तो बिलकुल नही, बस अपनी जिन्दगी की लम्हों को लोगों तक पहुचाने के लिए |
दादाजी ने एक आह भरी और कमरे से निकल लिए .........|

                                                                                                                            -  अतुल गुप्ता 

Sunday, 24 November 2019

टैलेंट होता नही बल्कि बनाया जाता है |

"टैलेंट ,धैर्य एवं किस्मत"
वरुण ग्रोवर जिनका परिचय देने की कोई जरुरत महसूस नही होती, उनका नाम ही काफी है, वो किसी परिचय के मोहताज नही |
साहित्य के मंच पर कही गई ये लाइन बहुत से युवाओं को एक संदेश दे गई, की टेलेंट की परिभाषा असल में कुछ और ही है | ज्यादातर जब किसी सफल व्यक्ति से से सफलता का राज पूछा जाता है तो 2 ही बाते सुनने को मिलती है, 1 तो हार्ड मेहनत, और दूसरा बचपन से टेलेंट का होना| ये 'टेलेंट का होना' एक ऐसा शब्द है जो व्यक्ति को निराश कर देता है, वो दुसरे व्यक्तियों से अपने आप को कम महसूस करता है, या उसको समझ में ही नही आता की वाकई उनमें कुछ अनोखा है जो उसमें टेलेंट दिखा सके | में भी पहले यही सोचता था की कुछ लोग वाकई किस्मत वाले होते है जिनके अन्दर बचपन से ही टेलेंट होता है , हाँ अबतक तो में यही सोचता था |
लेकिन यूट्यूब पर जब उस INTERVIEW को देखा तो असल में सभी शब्दों का मतलब समझ में आया |
"टैलेंट ,धैर्य एवं किस्मत" 
वरुण सर ने बहुत ही कम शब्दों में असल में इनका मतलब समझाया , सही मायने में देख जाये तो किस्मत अपने हाथ में नही होती | कोई व्यक्ति ये नही कह सकता की उसकी किस्मत बहुत अच्छी है जबतक उसके साथ कुछ गलत न घटित हो जाये | आप किसी भी व्यक्ति से पूछोगे की आपकी किस्मत अच्छी है तो उसका जबाब होगा पता नही अभी तक तो कुछ अच्छा नही हो रहा जिन्दगी में तो सही मायने में किस्मत को किस्मत के ऊपर ही छोड़ देते है | 
धैर्य  ही जीवन का सबसे कठिन कार्य है, क्योंकि यही वो समय होता है जब आपको अपने ऊपर पुरा विश्वास रखना होता है | हर पल आपको अपने आपको समझाना पड़ता है की अभी रुक अभी हम मंजिल के बहुत करीब है , मन का क्या वो तो भागेगा क्योंकि वो तो है ही चंचल, दिमाग आपको डराएगा, आपको दिखायेगा की अगर ये नही हुआ तो हम सबसे पिछड़ जायेंगे, हम उन असफल व्यक्तियों में आ जायेंगे जिनका मजाक ये दुनिया उड़ाती है | यही समय होता है जब हमें अपने दिमाग को विश्वास दिलाना होता है सब ठीक है बस अच्छे दिन आने वाले है, अपने दिमाग को उन सफल व्यक्तियों की जीवनी बताओ , उसे दिखाओं की कैसे उन्होंने बहुत बड़ा संघर्ष किया था अपनी पहचान बनाने के लिए और उन्होंने कैसे आखिर में अपनी पहचान बनाई थी |
टैलेंट सच में किसी भी व्यक्ति के पास कोई टैलेंट होता ही नही उसे ये सब मिलता है पड़कर, समझकर, और उस कार्य में अपनी अभिरुचि दिखाकर | असल में यही बात है जो मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित करती है और जिस से में अनजान था | टैलेंट, को अलग से शब्द से देखा जाये तो जिस काम में आपका मन लगता है, जो काम  सबसे ज्यादा अच्छा लगता है उसी को करना, उसी काम को अपने करियर के रूप में करना | जब आप अपने पसंदीदा काम को करते है तो आपका मन उस काम को अच्छी तरह और रूचि के साथ करता है | 
ये लेख बहुत से मेरे जैसे युवाओं को एक प्रेरणा देगा की हमें अपने लिए काम करना है, किसी को खुश करने के लिए नही | 

                                                                                                                             
                                                                                                                               (अतुल गुप्ता )